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Joshi Sir Ke Saath Pehli Chudaai-1


यह कहानी में अपने मित्र
श्री वरिन्द्रसिंह जी के
प्रोत्साहन को पा कर लिख
रहा हूँ. यह कहानी है की कैसे
मैंने पहली बार जीवन में , २५
साल की उम्र में सम्भोग
किया. एक अपने से बड़ी उम्र के
पुरुष के साथ…
मेरा बचपन बहुत ख़ुशी और
प्रेम से भरपूर था. मेरे
पिता बनारस में नामी ग्रामी
आर्किटेक्ट और पोलिटिकल
वर्कर थे, अब रिटायर्ड हैं
और अब भी उनका बड़ा नाम है.
माँ सोशल वर्कर थीं. मैं और
मेरी दो बड़ी बहनें, एक उप्पर
मिडिल क्लास जॉइंट फॅमिली
में पले बढे. दादा दादी की
निगरानी मैं संरक्षित बचपन
गुज़रा.

मैं एक बहुत शर्मीला बालक
था और मुझे बचपन से ही बड़ों
को खुश करना बहुत पसंद था.
पढ़ाई में तेज़ होने के कारन
में सबकी आँखों का तारा रहा,
चाहे वो टीचर हों या
रिश्तेदार. स्कूल के बाद
दिल्ली के एक बेहतरीन
इंजीनियरिंग कॉलेज में
दाखिल हो गया. दिल्ली में
मैं अपनी एक बुआ के घर पर ही
रहा. कभी हॉस्टल में नहीं
गया. इसलिए वहां भी शेलटरड
लाइफ ही थी. मेरे ज़्यादा
लड़के दोस्त नहीं थे, और न ही
मेरी उनसे बात करने में
ज़्यादा रूचि थी.

डिग्री ख़तम करने के बाद
जल्द ही एक बहुत अच्छी
मल्टीनेशनल कंपनी में मेरी
नौकरी लग गयी, दिल्ली में ही.
बुआ अब अपने बेटे के पास
अमेरिका जाना चाहती थे, तो
मैं उनके घर पर अकेला था,
एक-आध नौकर के अलावा.

इस दौरान मेरी कई लेडी
फ्रेंड्स भी बनी. कुछ के साथ
दोस्ती काफी घनिष्ट भी हो
गयी. उन में से कुछ ने मुझ से
पुछा भी, शादी का क्या ख्याल
है? इरादा है भी, या फिर
सिर्फ घूमने फिरने का प्लान
है? दिल्ली में लड़कियां
वक़्त नहीं ज़ाया करती, और ठीक
भी है, उनके नज़रिये से.

पर सच बोलूं तो मुझे अंदर से
पता था की में उन्हें नहीं
ढून्ढ रहा, और न ही उन्हें
खुश रख पाउँगा. वो मेरे
अच्छे स्वभाव, मेरे रूप, और
मेरी अच्छी ज़िन्दगी से
आकर्षित होती थीं, पर में
उनके प्रति शारीरिक तौर पर
बिलकुल भी इंटरेस्टेड नहीं
होता था… मुझे तो मेरे अधेड़
और बूढ़े प्रोफेसर और नौकरी
में सीनियर्स और बॉसेस के
पास ही वक़्त बिताना पसंद
था… सेक्स के मामले में
अनुभवहीन था, और अपनी सेक्स
इच्छाओं को दबा के रक्खा
हुआ था, कोशिश करता था की जो
आकर्षण मुझे आदमियों की तरफ
होता है उसे भूल जाऊं.

ऐसे ही, देखते देखते मैं २५
साल का हो गया. आप अचरज कर
रहे होंगे, की ये कैसे हो
सकता है की पच्चीस की उम्र
तक में अपनी सेक्सुअलिटी के
बारे मैं कन्फ्यूज्ड था… पर
ये सच है. बाद में मैंने पढ़ा,
इसे “सेल्फ डिनायल” कहते हैं,
यानी खुद से ही मुकर जाना…

मैं मुठ ज़रूर मारता था. पर उन
में मेरे ख्याली पुलाव ऐसे
होते की कोई बड़ी उम्र का
बलिष्ठ पुरुष अपने से छोटी
लेडी या आदमी के साथ
यौनाचार कर रहा है. और मैं या
तो उन्हें देख रहा हूँ, या
उनके पास जा कर उनके
गुप्तांगों को सहला रहा
हूँ…

मुझे साउथ इंडियन और गांव
वाले देसी आदमी ना जाने
क्यों बहुत पसंद थे (और अब भी
हैं), तो अक्सर मेरे सपनो में
वो आदमी सांवले रंग के होते,
छाती पर बाल, चेहरे पे बड़ी
बड़ी मूछें और कमर पर लुंगी
पहने हुए…

सच बताऊँ तो मुझे अपने
विचारों पर काफी शर्म आती
थी, और मैं किसी को भी ये
बताने में अपने को असमर्थ
समझता था… मुझे लगता था की
दुनिया में में बिलकुल
अकेला और अनोखा हूँ, और मेरे
जैसी गन्दी और विकृत सोच
किसी की नहीं होगी…

ऐसे ही चलता गया की एक दिन,
मेरे एक ऑफिस के नौजवान
मित्र ने मुझे कहा की, “आजकल
ऑनलाइन सेक्स बहुत आसानी से
मिलने लग गया है. न सिर्फ
औरतें, बल्कि सिर्फ
चुस्वाने के लिए लौंडे भी…”
हालाँकि वह तो मज़ाक में
अपने खुद के लन्ड चुस्वाने
के एंगल से बात कर रहा था, पर
मेरे मन में एक विचार तीर की
तरह दौड़ गया..